tag:blogger.com,1999:blog-89326372007-08-31T01:38:47.480-07:00अपनी बातRamannoreply@blogger.comBlogger19125tag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1117430660550575972005-05-30T15:42:00.000-07:002005-05-30T15:50:37.203-07:00बंटी और बबली (Bunty aur Babli)<div style="float: right; margin-left: 10px; margin-bottom: 10px;"> <a href="http://www.flickr.com/photos/31494044@N00/16368996/" title="photo sharing"><img src="http://photos13.flickr.com/16368996_427650179e_m.jpg" alt="" style="border: 2px solid rgb(0, 0, 0);" /></a><br /><span style="margin-top: 0px;font-size:0;" > <a href="http://www.flickr.com/photos/31494044@N00/16368996/">bb</a><br />Originally uploaded by <a href="http://www.flickr.com/people/31494044@N00/">Raman B</a>.<br /></span></div><br /><br />भाई मजा आ गया ये फिल्म देखकर .. बहुत ही बढ़िया कामेडी .. चुस्त, तेजतरार्र बहुत ही बढ़िया डायलाग्स .. बहुत बढ़िया गाने .. बहुत ही अथेंटिक लोकेशन्स .. बहुत बढ़िया अभिनय ... कुल मिला के सब कुछ बहुतै बढ़िया... एकदम टोटल टाईमपास ..<br /><br />फिल्म के काफी हिस्से की शूटिंग कानपुर लखनऊ और यूपी के दूसरे शहरों में हुई है .. जाहिर है यूपी वालों को और भी मजा आयेगा.. फिल्म की प्रस्तुति में नयापन लगता है.. डायलाग्स यूपी में आमतौर पर बोली जाने वाली भाषा की तरह ही लगते हैं .. जाहिर है कि यूपी के छोटे कस्बे में पले बढ़े होने की वजह से मुझे फिल्म के इस हिस्से में बहुत ही मजा आया ..<br /><br />फिल्म की कहानी मि. नटवरलाल, Bonnie And Clyde और Catch Me If You Can जैसी फिल्मों की तरह है. फिल्म बहुत ही फास्ट पेस्ड है और चुस्त है.. पटकथा कहीं पर भी बोझिल नहीं होती. <br /><br />जरूर ये फिल्म देखें और मजा पाईये. आप चाहें तो रीडिफ पर पूरी समीक्षा <a href="http://in.rediff.com/movies/2005/may/27bunty.htm"><span style="font-weight:bold;"><span style="font-weight:bold;">यहां</span></span></a> देख सकते हैं.Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1116653468453651792005-05-24T23:54:00.000-07:002005-05-24T23:54:22.216-07:00अप्रैजल टाइम (Appraisal time)कहा जाता है कि चाहे कितनी भी ज्यादा तनख्वाह हो लेकिन हमेशा कम ही लगती है. हर साल की तरह आजकल भी इस साल का अप्रैज़ल चल रहा है. हमेशा की तरह इस साल भी लोग इन्तज़ार कर रहे हैं कि उनको जबर्दस्त रेटिंग मिलेगी और उसी हिसाब से तनख्वाह भी अच्छी खासी बढ़ाई जायेगी. खासतौर से भारत में लोग काफी ज्यादा aggresive हैं इस बारे में, क्यूँकि इस वक्त भारत में बाजार खासा गरम है और लोगों को मनमुआफिक तनख्वाहें मिल रही है. कईयों ने तो इरादा पक्का कर लिया है कि अगर इस बार कम्पनी ने अच्छी बढ़ोत्तरी नहीं दी तो इस कम्पनी से इस्तीफा दे देंगे. उसी हिसाब से लोग जोर शोर से अपना resume बनाने और दूसरी कंपनियों में इंटरव्यू देने में लगे हुये हैं.<br /><br />अमेरिका में होने की वजह से कुदरतन पिछले दो सालों से कम्पनी ने आनसाईट consultants को ज्यादा महत्व नहीं दिया है. पिछलों दो सालो से अमेरिका में वेतन औसतन 3% तक बढ़ाया गया है जबकि उसके मुकाबले में भारत में १२% से १५% तक की बढ़ोत्तरी हुई है.<br /><br />जहां एक तरफ लोग अप्रैजल की मारामारी में लगे हुये है, वहीं इधर कुछ सालों से मेरा अप्रैजल से जुड़ाव काफी कम हो गया है. पिछले दो सालों में तो मेरा अप्रैजल तो जैसे हुआ ही नहीं. इस साल भी मेरी बजाय मेरा बास ही हाथ धो के अप्रैजल करने के पीछे पड़ गया था. जैसे तैसे अप्रैजल फार्म भर के उसको पकड़ा दिया. जाहिर है कि मैं वेतन में बढ़ोत्तरी की उम्मीद भी नहीं कर रहा हूं. मैं यूं ही सोच रहा था कि मेरे अप्रैजल से इस तरह से detach होने की वजह कया है? एक तो शायद ये कि मै वैसे ही अपना काम जैसे तैसे करके निपटा रहा हूं और बीच बीच में शार्टकट मारता रहता हूं, हलांकि अभी तक कंपनी मुझे अच्छा कंसल्टैन्ट ही मानती है क्यूंकि अभी तक clients से मेरी फीडबैक अच्छी ही आई है. दूसरा ये कि मेरी प्राथमिकता है शान्तिपूर्ण और stress-free जाब, फिर उसका मतलब भले थोड़े कम पैसे मिलें.<br /><br />यहां पर एक बात साफ कर देना चाहता हूं कि ए॓सा नहीं हैं कि पैसे से मेरा लगाव या मोह निकल गया हो या फिर ऐसा भी नहीं कि आध्यात्मिक अंदाज मे मैं पैसे को मोह माया का जंजाल या मिथ्या समझूं. हर आम आदमी की तरह मेरी भी यही ख्वाहिश है कि मेरे पास ढेरों पैसे हों और मुझे कभी भी पैसों कि जरूरत होने पर किसी का मोहताज न होना पड़े.<br /><br />कुल मिला के अगर गलती से मुझे अप्रैजल के बाद ज्यादा वेतन मिलने लगे तो ये नाचीज जरूर खुश हो जायेगा. लेकिन अगर वेतन नहीं बढ़ा तो भी चलेगा.Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1113192206801502172005-04-16T14:02:00.000-07:002005-04-16T14:00:40.276-07:00शोभा डे : 'सितारों की रातें'अभी हाल ही में <a href="http://www.goacom.com/goatoday/98/jan/barbosa.html"><span style="font-weight: bold;">शोभा डे</span></a> की किताब <a style="font-weight: bold;" href="http://www.mouthshut.com/review/Starry_Nights_-_Shobha_De-48629-1.html">'सितारों की रातें'</a> पड़ी है. ये शोभा की अंग्रेज़ी क़िताब Starry Nights का हिन्दी अनुवाद है. शोभा जी के लिखने के स्टाईल को कुछ लोग साफ्ट पोर्न कहते हैं तो कुछ लोग इसे पल्प फिक्शन भी कहते है. बहरहाल मुझे न तो ये पता है कि पल्प फिक्शन क्या होता है और नही ये पता है कि इस किताब को साफ्ट पोर्न या पल्प फिक्शन की श्रेणी में डालना चाहिये. मैं तो सिर्फ इस किताब के कुछ खास पहलूओं के बारे में अपना नज़रिया पेश कर रहा हूं.<br /><br /><span style="font-weight: bold;">१. बेहतरीन हिन्दी अनुवाद</span><br /><br />इस किताब के हिन्दी अनुवादक का नाम मोज़ेज़ माईकल लिखा है. कभी इनका नाम नहीं सुना है लेकिन इतना जरूर कहना पड़ेगा कि बहुत ही बेहतरीन अनुवाद किया है. एकदम चुस्त और फर्राटेदार आम बोलचाल वाली हिन्दी और उर्दू का प्रयोग किया है इन्होने. कहीं पे भी ऐसा नहीं लगता कि अनुवाद किया गया है और भाषा बिल्कुल भी बोझिल नहीं लगती. अनुवाद का एक नमूना नीचे देखिये.<br /><br />" उसकी बगल में बैठे आदमी का कसमसाना पहले ही शुरू हो गया था. किशनभाई ने धीमे से उसे गरियाया. सिंथेटिक कपड़े का नीला कुरता पाजामा पहने यह दो कौड़ी का भंगी आज रात गोपालजी बना बैठा है. ,गोपालजी माई फूट,, उसने फनफनाते हुये धीमे से कहा. वह कोई गोपालजी वोपालजी नहीं था. वह तो मुंबई की गंदी नालियों का भंगी था, भंगी. और आज वही कुतिया का पिल्ला प्रोड्यूसर बना बैठा है. बड़े नाम, बड़े दामवाला प्रोड्यूसर. हरामजादा ! अभी सात साल पहले यही आदमी किशनभाई की प्रोडक्शन कंपनी में यूनिट की जीहुजूरी किया करता था. "<br /><br /><span style="font-weight: bold;">२. चुस्त , तेजतर्रार , पेजटर्नर (पन्ना पल्टो) स्टाईल</span><br /><br />वैसे किताब में कहानी तो कुछ खास नहीं है. खासतौर से ये दिखाया गया है कि मुख्य नायिका शुरुआत में सफलता प्राप्त करने के लिये कैसे सबके साथ हमबिस्तर होती रहती है और इस नर्क में डालने वाला कोई पराया नहीं बल्कि उसकी अपनी मां है. साथ में ये भी दिखाया कि किस तरह से फिल्मी दुनिया पूरी तरह से मर्दों के काबू में हैं. बाद में फिल्मी दुनिया के अंदरूनी रंग ढंग और लटके झटके दिखाये गये हैं. वैसे अभी हाल ही में मीडिया में <a style="font-weight: bold;" href="http://www.bollywood.com/archives/2005/03/bollywood_actor.html">कास्टिंग काऊच </a> को लेकर काफ़ी हल्ला भी हुआ था.<br /><br />लेकिन कहानी या प्लाट न होने के बावजूद भी किताब एकदम चुस्त, तेजतर्रार पेजटर्नर अंदाज में लिखी गई है. गालीगलौज और गन्दी भाषा का भी खुलकर किया गया है. किताब की ये विशेषता है कि एकबार आप किताब पढ़ना शुरू करेंगे तो फर्र फर्र पढ़ते चले जायेंगे और किताब छोड़ नहीं पायेंगे.<br /><br /><span style="font-weight: bold;">३. साफ्ट पोर्न , सेक्स की अधिकता</span><br /><br />किताब में सेक्स के बारे बहुत ही खुला खुला और बार बार लिखा गया है. हर तरीके के सेक्स एनकाऊंटर्स का बहुत ही खुला खुला और पूरा पूरा वर्णन है. कुछ भी लाग लपेट के बजाय सेक्स को एक खेल , एक जश्न या महाआनंद की तरह भी पेश किया गया है. कुछ लोगों को सेक्स की अधिकता एक बीमार मानसिकता भी लग सकती है. कुछ बानगी नीचे देखिये.<br /><br />"मालिनी ने चीखते हुए कहा, "अपने इस साले फलसफे और लेक्चरबाजी को अपने चूतड़ों में घुसेड़ लो. मुझे तो मेरा पति वापस दो !<br />..........<br />..........<br />मालिनी ने चीखकर कहा, "सेक्स ! बस यही है तुम्हारे पास , सेक्स ! तुम्हारी जैसी औरतें इसी का इस्तेमाल करती हैं. घटिया कुत्तियों...अपनी टांगें उठाती हो और किसी भी आदमी को अंदर ले लेती हो. सेक्स, सेक्स, सेक्स, गंदा, घिनौना सेक्स! विकृत सेक्सवालियों ! तुम जरूर विकृत सेकस का इस्तेमाल करती होगी. कया करती हो तुम उसके साथ, हैं? उसका भंटा चूसती हो? या अपनी छातियों से उसका दम घोंटती हो ?"<br /><br />"यह कहकर आशा रानी उसके ऊपर चढ़ गई थी, और दिव्य गंध वाला वह तेल डलकर धीरे धीरे उसकी मालिश करने लगी थी. वह किसी लोचदार नर्तकी की तरह हरकत कर रही थी. उसके बाल अक्षय के पूरे सीने पर फैल रहे थे, उसके उरोज अक्षय के मुँह पर आ जा रहे थे, उनकी घुंडियाँ रह रहकर अक्षय के होंठों से छू रही थीं. "सेक्सी औरत, यह सब कहाँ से सीखा तुमने ?" "<br /><br /><span style="font-weight: bold;">४. सारांश</span><br /><br />कुलमिला कर ये कोई साहित्यिक किस्म की किताब नहीं है. और कोई ऐसी किताब भी नहीं जिसे पढ़ना एकदम जरुरी कहा जा सकता है. हां लेकिन अगर आप बहुत दिनों से भारी भरकम साहित्यिक किस्म की किताबें पढ़ पढ़ के ऊब चुके हैं तो कभी आप बदलाव के लिये हल्की फ़ुल्की या सतही किस्म की किताब पढ़ना चाहें तो इस किताब को जरूर पढ़ सकते है. एकदम चटपटी गोली की तरह लगेगी यह किताब. बिल्कुल उसी तरह जैसे लगातार शाष्त्रीय संगीत सुनते रहने के बाद बीच मे बदलाव के लियें फिल्मी गाने सुने जाय तो अच्छा लगता है<br /><br />बाद में इंटरनेट पर उधर उधर देखते हुये मुझे ये भी पता चला है कि यह किताब (अंग्रेज़ी वर्ज़न) बंबई विश्वविद्यालय और कुछ दूसरे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भी शामिल है.Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1110525122302921032005-03-10T23:05:00.000-08:002005-03-13T16:59:23.863-08:00बचपन के मीत :: पर्चे की अदला-बदली<img alt="Akshargram Anugunj" src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" align="right" height="100" hspace="5" vspace="5" width="187" /><br />बहुत से मित्र थे बचपन के. कुछ एक का साथ छूट गया. लेकिन अभी भी कुछ एक से साथ कायम है और बाकियों की ख़बरें इधर उधर से मिलती रहती है.सब दोस्तों के बारे में तो शायद बाद में कभी लिखूंगा लेकिन अपने दोस्त महेश के बारे में इस लेख में लिख रहा हूं. हम लोगों ने न जाने कितना वक्त एक दूसरे के साथ गुजारा है. महेश , मैं और कभी कभार कुछ दूसरे दोस्त शाम को मटरगश्ती पर निकल जाते थे. कभी महफ़िल पार्क में सजती थी, कभी नदी के किनारे, कभी पहाड़ पर तो कभी स्टेशन रोड के बाज़ार में. चाय , समोसे, मूँगफली, लुड़ईयों और कभी हरी चटनी के साथ सिंघाड़ों का दौर चलता था. दुनिया भर की लफ्फाजी,हँसी,मजाक और इधर उधर की बातों में तुरंत सारी शाम गुजर जाती थी. जब वापस घर जाने का समय आता तो पान खाकर सब लोग वापस जाते थे.मैं ज्यादा पान नहीं खाता था तो पान के लिये कभी कभी मना कर देता था लेकिन मजाल है कि यूपी में यार दोस्त मिलें और पान न हो. कई बार तो लोग बाग कहते थे अरे भईया पान खाये बग़ैर कैसे चले जाओगे.<br /><br />एक वाकया बताता हूँ. यूपी बोर्ड के हाईस्कूल के इम्तहान चल रहे थे. महेश की तैयारी ठीक नहीं थी और गणित के पर्चे में उसे मेरी मदद की जरुरत थी और प्लान ये बना की मैं अपने पर्चे में कुछ प्रश्नों के उत्तर लिख दूंगा और हम लोग परीक्षा शुरू होने के एक घंटे के बाद बाथरूम मेँ मिलेंगे और पर्चा बदल लेंगे. तयशुदा वक्त पर हम लोग बाथरूम में मिले और हम लोगों ने पर्चे की अदलाबदली की. लेकिन महेश कुछ और प्रश्नों के बारे में भी पूछना चाहता था. मैंने जल्दीबाजी में उसे एकाध सवालों के जवाब समझाये लेकिन महेश को कुछ ज्यादा ही मदद की जरूरत थी और उसकी जिद पर हम लोग गलियारे में एक दीवार से सटकर खड़े हो गये और मैं उसे बताने लगा. तभी मैंने देखा कि एक अध्यापक गलियारे से गुजरा और उसने हम लोगों को देख लिया. मेरी तो सिट्टी पिट्टी ग़ुम हो गयी. लेकिन वो अध्यापक बहुत ही शरीफ़ निकला और हम लोग को बिना कुछ कहे निकल गया. और इस तरह से मेरी जान में जान आई और मैं अपने कमरे में भागा और महेश अपने कमरे में.<br /><br />मैंने भगवान का नाम लेते हुये चुपचाप अपना पर्चा खतम किया और बाहर निकला. बाहर निकलने के बाद महेश ने मुझे बताया कि अपने कमरे में पहुँचने के बाद उसने बदले हुये पर्चे की मदद से लिखना शुरू किया लेकिन थोड़ी देर के बाद पता नहीं कैसे उसके कमरे के निरीक्षक को ये शक हो गया कि उसने पर्चा बदला है क्यूंकि उसने पर्चे में कुछ लिखा हुआ देख लिया था. उसने महेश को बहुत सताया और बार बार उस पर दबाव डाला कि बताओ किससे पर्चा बदला है. उसने एड़ी चोटी का जोर लगाया ये पता लगाने के लिये कि पर्चा किस से बदला गया है. यहीं नहीं उसने सारे कमरे में दूसरे लड़कों से भी पूछताछ की लेकिन उसे कुछ पता नहीं चला. उसे ये लग रहा था की पर्चा इसी कमरे में बदला गया है और उसे ये जरा भी अहसास नहीं हुआ कि पर्चा बाहर से बदला गया है. अगर निरीक्षक को इस बात की जरा भी भनक मिल जाती कि पर्चा बाहर से बदला गया तो निश्चित रूप से हम दोनों पकड़े जाते थे और हम लोग जरुर रस्टीकेट कर दिये जाते थे. महेश की बातें सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गये और मुझे ऐसे लगा जैसे मौत के मुंह से बच के निकल के आया हूँ.<br /><br />उस दिन अगर मैं पकड़ा जाता तो जरूर दसवी में फेल हो जाता और बाद में शायद मेरे कैरियर का कबाड़ा भी हो सकता था. इस घटना के बाद भी हम लोगों की दोस्ती में फ़र्क नही आया. अब आजकल मैं अपनी नौकरी में व्यस्त हूँ और मेरा दोस्त अपनी दुकानदारी में व्यस्त रहता है. लेकिन अब भी जब अपने कस्बे में छुट्टियों में वापस जाता हूं तो उसके साथ काफ़ी वक्त गुजरता है और बीते हुये दिनों की यादें ताजा होती हैं.Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1109315525113775452005-02-24T23:08:00.000-08:002005-02-24T23:20:18.740-08:00अनुगूँज ६ - शरीर और आत्मा का मिलन<img alt="Akshargram Anugunj" src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" align="right" height="100" hspace="5" vspace="5" width="187" /><br />भूत-प्रेत, जादूटोना, ज्योतिष और तरह तरह की चमत्कारिक चीजों के बारे मे जानने और सुनने की मुझे हमेशा उत्सुकता रही है. इन विषयों पर अच्छी किताबें पढ़ना और लोगों से सुनना मुझे हमेशा अच्छा लगता है. जैसे इस बार की अनुगूँज मे जीतू भाई का सच्चा <a style="font-weight: bold;" href="http://www.jitu.info/merapanna/?p=272">किस्सा </a>पढ़ के बहुत ही आश्चर्य हुआ.<br /><br />वैसे मेरा अपना कोई भी अनुभव नहीं है, जिसे चमत्कार की श्रेणी में डाला जा सके. लेकिन दूसरों से सुनी सुनाई बातों के बारे में जरूर लिख सकता हूं. आपने ओशो रजनीश का नाम तो सुना ही होगा जोकि एक तरफ़ काफ़ी पहुँचे हुये दार्शनिक माने गये हैं तो दूसरी तरफ़ काफ़ी विवादों में घिरे और बदनाम रहे हैं. उन्हीं की मुँहज़बानी उनके कैसेट में सुना ये किस्सा याद आ रहा है.<br /><br />एक बार वो पेड़ के ऊपर काफी देर से ध्यानमग्न थे और जब बहुत ज्यादा गहरे ध्यान की स्थति में थे तो अचानक उनका शरीर पेड़ से गिर गया. उन्होने लिखा है कि उस छण में उनका शरीर उनकी आत्मा से अलग हो गया था. अब उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि इन दोनों का आपस में मिलन कैसे होगा तो उन्होने लिखा है कि कुछ देर में वहां से एक ग्रामीण औरत निकली और उसने उन्हें मरा हुआ समझकर छुआ, इससे उनके शरीर और आत्मा का पुनर्मिलन हो गया. उनकी बातों के अनुसार पुरूष शरीर में मादा स्पर्श से ऐसा संभव है और इसके विपरीत मादा शरीर में पुरूष स्पर्श से.<br /><br />उन्होंने आगे ये भी बताया है कि बाद में फिर कुछ और दफ़ा भी उन्होने यही घटना दोहराई. ऐसा कुछेक बार करने के बाद उन्होंने ये भी महसूस किया कि उनके शरीर का तालमेल बिगड़ गया है. बहरहाल इसमें कितना सच है, ये कहना तो बहुत मुश्किल है लेकिन अगर ये सचमुच सच है तो ये वाकई बहुत बड़ा चमत्कार है.Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1105336639142899742005-02-21T21:57:00.000-08:002005-02-22T12:46:13.363-08:00शापिंगएक ज़माना था जब मेरे लिये शापिंग का मतलब होता था सौदा सुल्फ़ ख़रीदना. किशोरावस्था के दिनों में माताजी मुझे सब सौदा बोलतीं थीं और मैं उसकी सूची बना लेता था. जब मैं सौदा सुल्फ़ लेने जाता था तो रास्ते में मिलने वाले परिचितों से जय राम जी की करता हुआ और बाज़ार से गुजरने वाली लड़कियों पर नज़र डालता हुये अपनी धुन में मस्त निकल जाता था. फिर दुकानदार के पास पहुँच कर उसे सूची पकड़ा देता था. मै बैठकर सेठ से राजनीतिक और दूसरी इधर उधर की बातें बतियाता रहता था, थोड़ी ही देर मे नौकर लोग सामान बांध देते थे और मैं दुकानदार को पैसे चुकाकर वापस घर का रास्ता नापता था. लेकिन आजकल आधुनिक समाज में शापिंग को कई नये आयाम दिये गये हैं और शापिंग को एक नये शिखर पर पहुंचाया गया है.<br /><br />अमेरिका मेँ तो ख़ास तौर से शापिंग को काफ़ी महत्व दिया जाता है. यहां की पूरी अर्थव्यवस्था ही उपभोक्तावाद पर कायम है. यहां पर शापिंग पर कई तरीके के अनुसंधान होते है. कुछ लोग शापिंग और उपभोक्ताओं की जरूरतों के गुरू माने जाते हैं तो कुछ लोगों ने इन विषयों मे डाक्टरेट तक किया हुआ होता है. कई विश्वविद्यालय शायद इन विषयों पर डिग्री भी प्रदान करते हैं. कई लोगों के लिये और खास तौर से महिलाओं के लिये शापिंग एक बहुत ही आनन्ददायी कृत्य होता है लेकिन कुछ लोगों के लिये शापिंग मुसीबत का पर्याय बन के आती है.<br /><br />वैसे तो कई तरह के शापर्स होते हैं, लेकिन कुछ ख़ास की बानगी नीचे देखिये.<br /><br /><span style="FONT-WEIGHT: bold">१. पुराने धाकड़, महारथी या मंजे हुये खिलाड़ी</span><br /><br />इस श्रेणी के जन्तु शापिंग के बहुत मंजे हुये खिलाड़ी होते हैं. शापिंग आयडियाज़ के लिये इनके पास काफ़ी मजबूत नेटवर्क होते हैं. शापिंग इन के लिये किसी साधना से कम नहीं होती है. ये शापिंग की विद्या मे पूर्णतया पारंगत होते हैं. अगर इन्हें शापिंग के जंगलों के शेर कहे तो कोई मुग़ालता नहीं होगा. अक्सर नौसिखये शापर्स इनकी सेवायें प्राप्त करके अपने आपको धन्य समझते हैं.<br /><br />कई देसी भाई भी इसी श्रेणी में आते हैं और ये पाया गया है कि कोई भी सामान लेने से पहले वे अपने सारे नेटवर्क में चेक कर लेते हैं और उसी के बाद ही वो कोई सामान ख़रीदते हैं. कईयों के नेटवर्क तो इतने मजबूत और विशाल होते हैं कि कोई भी नई और खास किस्म की चीज़ या कोई खास प्रमोशन या डील इनकी निगाहों से नही बच सकती.<br /><br /><span style="FONT-WEIGHT: bold">२. मध्यमार्गी</span><br /><br />ये लोग हमेशा बीच का रास्ता अख़्तयार करना पसंद करते हैं. न शापिंग इनके लिये मुसीबत होती है और न ही कोई खास आनन्दप्रदायक कृत्य. शापिंग को ये लोग एक अनिवार्य जरुरत या धर्म की तरह निभाते है. इनका सिद्धांत एकदम सरल होता है. बस जब जितना सामान जरूरी है तब उतना सामान खरीदा और अपने काम से मतलब रखा. ये लोग शापिंग पर ज्यादा माथापच्ची नहीं करते है और न हीं शापिंग पर बहुत ज्यादा समय नष्ट करते हैं.<br /><br /><span style="FONT-WEIGHT: bold">३ कंजूस मक्खीचूस या पेनीपिंचर या कूपन कटर</span><br /><br />इस श्रेणी के लोगों में हमेशा समय की अधिकता होती है और पैसों की कमी होती है. कुछ एक डालर बचाने के लिये ये लोग कितनी ही दुकानों के चक्कर लगा सकते हैं और न जाने कितना वक्त बरबाद कर सकते हैं. कुछ कुछ अमेरीकन दुकानदार इन्हें <a style="FONT-WEIGHT: bold" href="http://www.sfgate.com/cgi-bin/article.cgi?f=/news/archive/2004/07/05/national1332EDT0564.DTL">शैतान ग्राहक (Demon Customers)</a><span style="FONT-WEIGHT: bold"> </span>भी कहते हैं. इनका बस चले तो हर दुकानदार को चूस चूस कर उस का दिवाला निकाल दें. कहा जाता है कि लगभग ८०% छोटे कारोबार अपने पहले ही साल मेँ ध्वस्त हो जाते हैं. इसमें काफ़ी सारा योगदान शैतान ग्राहकों का भी रहता है. ऐसे शापर्स की वजह से उपभोक्ता खर्च इंडेक्स के कम हो जाने की होने की आशंका बनी रहती है और पूरी की पूरी मैक्रो अर्थव्यवस्था पर भी खतरों के बादल मंडराने के आसार नज़र आने लगते हैं.<br /><br />अपने हमवतन कुछ देसी भाई भी इसी श्रेणी में आते हैं. वो शापिंग के मामलों में महा-जुगाड़ू होते हैं. कई बार सामान मन मुआफ़िक न हुआ तो ऐसे देसी झूठमूठ का टंटा फैलाकर अपना कारज सिद्ध कर लेते हैं. कुछ लोग तो सामान लेते हैं और थोड़े दिन उसका मज़ा लेने के बाद झूठमूठ का बहाना बना कर या फिर जानबूझकर किसी सामान को तोड़फोड़ कर उसे वापस कर देते है.<br /><br />अमेरिका में ऐसे कई देसियों का पूरा का पूरा शनिवार शापिंग मेँ गुजर जाता है. आप पूछेंगे कि पूरा का पूरा दिन शापिंग में कैसे गुजर सकता है, तो इसकी वजह ये है की तरह तरह की शापिंग जो कि पैसों की बचत के लिये बहुत जरूरी है. मिसाल के तौर पर नीचे देखिये.<br /><br />१. अमेरीकन ग्रासरी शापिंग ( सेफ़वे वग़ैरह )<br />२. भारतीय ग्रासरी शापिंग ( इंडिया बाज़ार या देसी दुकान )<br />३. कास्को शापिंग ( थोक में सस्ता सामान )<br />४. जनरल शापिंग ( वालमार्ट वग़ैरह )<br />५. कपड़ों आदि की शापिंग ( जे सी पेनी , मेसीज , सीअर्स वगैरह )<br />६. खिड़की शापिंग ( सिर्फ़ सामान देखने वाली शापिंग )<br /><br />एक दूसरे सज्जन हैं, जिन्होने कार तो नयी नवेली SUV ले ली, लेकिन पेट्रोल के पैसे बचाने के चक्कर में कास्को जाना नहीं भूलते हैं. दूसरे एक दंपति जोकि वैसे अपने स्टेटस के बारे में काफ़ी सतर्क रहते है लेकिन चन्द डालर बचाने के लिये खासतौर से कास्को जाने में नहीं हिचकिचाते. मेरी कंपनी के भारत से जो कंसलटैन्ट आते हैं वो भी चाकलेट पर एक एक डालर बचाने के लिये खासतौर से कास्को जाने का इंतजाम करते हैं.<br /><br />ऐसे लोगों के बारे में एक लतीफ़ा भी मशहूर है.एक साहब मोल-तोल में काफ़ी उस्ताद थे. एक दिन बाज़ार में वो किसी दुकानदार से मोलतोल कर रहे थे. ५० रुपये की शर्ट पर एक घंटा मोलतोल करने के बाद दुकानदार एक रुपये में बेचने के लिये तैयार हो गया. लेकिन भाईसाहब अड़े रहे और फिर भी मोलतोल करते रहे. तंग आकर दुकानदार ने कहा कि ठीक है मेरे बाप आप मुफ़्त में ले जाईये. भाईसहब ने थोड़ी देर सोचा फिर कहा, मुफ़्त में दो शर्ट दोगे क्या?<br /><br /><span style="FONT-WEIGHT: bold">४. पुराने क़ाहिल</span><br /><br />इन लोगों के लिये शापिंग एक बहुत भारी मुसीबत का नाम है. बीवी के मुँह से शापिंग का नाम सुनते ही इनके पसीने छूटने लगते हैं. मेरी श्रीमतीजी जब भी मुझे बाज़ार ले जाती हैं तो मुझे लगता है कि जितना जल्दी से जल्दी हो सके शापिंग ख़तम की जाये, इसीलिये हमेशा श्रीमतीजी मुझसे तंग आ जाती हैं.<br /><br />वैसे हर शापिंग-खिलाफ़ पति का अपनी शापिंग-पसन्द पत्नि से कुछ न कुछ अरेंजमेन्ट होता है. अब अपने <a style="FONT-WEIGHT: bold" href="http://hankabaji.blogspot.com/">काली</a> भाई को ही ले लीजिये, इनकी श्रीमतीजी भी काफ़ी<a style="FONT-WEIGHT: bold" href="http://hankabaji.blogspot.com/2005/01/blog-post.html"> हमदर्द</a> हैं और जब भी काली भाई थके हुये होते हैं तो इनकी पत्नि काफ़ी मुरव्वत करके शापिंग बैग खुद ही उठा लेती हैं. मेरी बीवी भी जब मैं थका हुआ या शापिंग मूड में नहीं होता हूँ तो सिर्फ पिकअप , ड्राप और बेबीसिटिंग के लिये मुझे याद करती हैं और मुझ पर भारी अहसान करते हुये शापिंग के कष्ट से मुझे बचाती हैं.<br /><br /><span style="FONT-WEIGHT: bold">५. अनियंत्रित शापर्स (compulsive shoppers)</span><br /><br />ये शापर्स अपने आप पर बिल्कुल भी नियंत्रण नहीं कर सकते. कोई भी नई चीज़ जिस पर इनकी नज़र पड़ जाती है ये लोग उसे खरीदना चाहते हैं भले ही उस चीज़ की उन्हें बिलकुल भी जरूरत न हो या फिर वो उनकी हैसियत के बाहर हो. अगर इन्हें इनकी पसंद की चीज़ लेने से रोकने की कोशिश की जाये तो ये खुदकुशी करने पर उतारू हो जाते हैं.<br /><br />दुकानदार और क्रेडिट कार्ड कंपनियां इन्हें काफ़ी पसन्द करते हैं और ऐसे लोगों को आदर्श ग्राहक मानते हैं. सामान तो ये लोग बहुत सारा ले आते हैं लेकिन कई बार सामान इस्तेमाल करना तो दूर, ये सामान खोलते तक नहीं हैं. ऐसे लोगों के घर और गैराज़ में तिल रखने की भी जगह नहीं होती है. कई बार इनके गैराज़ सामानों के बन्द डब्बों से गंधाते रहते हैं.<br /><br />तो ये थे शापिंग के बारे में इस नाचीज़ के तुच्छ विचार. लेकिन आप किस सोच में डूब गये हैं? ज़्यादा सोचिये मत, अपनी श्रीमतीजी से इस वीकेन्ड का शापिंग प्लान पूछिये और अपना बटुआ हल्का करने का इंतज़ाम कीजिये ;)Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1107360761440342442005-02-10T08:12:00.000-08:002005-02-11T23:10:09.150-08:00आ जा सांवरिया तोहें गरवां लगा लूंकुछ सालों पहले देसी वीडीयो के दुकान में और कोई फ़िल्म न होने की वजह से मजबूरी में गमन फ़िल्म का वीडियोकैसेट ले आया था. मुज़फ़्फ़र अली की इस बेहतरीन फ़िल्म की शुरूआत ही इस haunting ठुमरी के साथ होती है. गाने के साथ ही बैकग्राउन्ड में उनके पैतृक गांव के दृश्य दिखाये गये हैं. इस ठुमरी में और इस सीन में इतनी कसक थी कि न जाने कितनी बार रिवाइन्ड करके मैंने ये सीन और गाना देखा.३-४ मिनिट के इस सीन और इस गाने में इतनी कसक और नोस्तालजिया है कि आपके सामने सीधे अपने गांव या वतन की तस्वीर आ जायेगी और बार बार ये ठुमरी सुनने की और ये सीन देखने की आपकी इच्छा होगी.<br /><br />इस जबर्दस्त ठुमरी को संगीतबद्ध किया है पंडित जयदेव ने और गाया है हीरा देवी मिश्रा ने. हीरादेवी मिश्रा ने इस ठुमरी को इतना बढ़िया गाया है कि इसे बार बार सुनने की इच्छा होती है. वैसे अच्छे गाने और ठुमरियां काफ़ी सुनी हैं लेकिन कसम से इतनी जबर्दस्त ठुमरी पहले कभी नहीं सुनी है.<br /><br />गमन की वीडियो कैसेट तो मिल रही है लेकिन इस गाने का आडियो नहीं मिल रहा है.. मैंने नेट पर भी ढ़ूंढ़ा और सारेगामा से भी पूछा लेकिन ये आडियो नहीं मिला. HMV ने गमन का कैसेट निकाला है लेकिन उसमें भी ये गाना उपलब्ध नही हैं. अफ़सोस सद अफ़सोस कि इतना बेहतरीन गाना कहीं पर मिल ही नहीं रहा है.<br /><br />कुछ साल पहले रिलीज हुई फ़िल्म 'मानसून वैडिंग' में इसी ठुमरी का रिमिक्स <strong><a href="http://www.musicindiaonline.com/ms/g/FFIy_-FFJ.jL/index.html">फैब्रिक</a></strong> नाम से पेश किया गया है. हलांकि एक तरफ रिमिक्स बनाकर इस अच्छी खासी ठुमरी का ठुमरा बना दिया गया है लेकिन दूसरी तरफ़ ओरिजनल नहीं तो कम से कम रिमिक्स तो सुनने को मिल रहा है..<br /><br />मुझे लगता है इस ठुमरी के बोल काफ़ी पुराने हैं क्योंकि कुछ दिनों पहले मुझे भीमसेन जोशी द्वारा बहुत पहले गाई गई इसी ठुमरी का mp3 मिला है.. लेकिन गमन वाले version की बात ही कुछ और है.<br /><br />अगर किसी को गाने के बारे में या गायिका के बारे में और जानकारी हो तो जरूर बताएं.Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1106856487722522892005-01-27T13:05:00.000-08:002005-01-27T13:56:57.436-08:00टेनिस , आस्ट्रेलियन ओपेन और सानियाइधर <a href="http://www.ausopen.org"><strong>आस्ट्रेलियन ओपेन</strong> </a>के कुछ कुछ मैचों का मज़ा ले रहा हूँ. समाचारों में पढ़ा कि रोजर फेडरेर और सफ़िन के बीच बहुत ही ज़बरदस्त मुक़ाबला हुआ. रोजर भैय्या , जो कि पिछले १-२ सालों से एकदम अपराजेय थे, उनको सफ़िन ने साढ़े ४ घंटे के जबरदस्त युद्ध के बाद मात दी. आज मै बहुत ही बेचैन हूं और रोजर फेडरेर और सफ़िन का ये मैच देखना चाहता हूं लेकिन ये मैच ठीक दोपहर में आ रहा है जब मैं आफ़िस में मैं अपना सर खपा रहा हूंगा. इस नये प्रोजेक्ट की ८ १० घंटे की मशक्कत और २ ३ घंटे की commuting ने मेरे weekdays की ऐसी मट्टीपलीद की है कि पूछिये मत. समय की इतनी जबरदस्त कमी चली रही कि क्या बतायें.
<br />
<br />कल रात को <a href="http://www.mariaworld.net/"><strong>मारिया शरापोवा</strong> </a>और सेरिना विलियम्स का मैच भी बहुत ही धुआंधार हुआ. आखिरी सैट में तो दोनों बिल्कुल करो य मरो के मूड में आकर खेल रहीं थी. तीन बार मारिया जीत के बिल्कुल करीब पहुँच गई थी लेकिन सेरीना ने मारिया के मुँह से जीत निकालकर अपनी जीत दर्ज की.
<br />
<br />ओपेन की शुरूआत में अपनी हैदराबादी पोट्टी <a href="http://www.realtricks.com/tips/files/sania_mirza_photos.html"><strong>सानिया</strong></a> ने भी बहुत ही धमाकेदार तरीके से खेला और पूरे हिन्दुस्तान में सनसनी फैला दी. उम्मीद है सानिया दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की करेगी और भारत का नाम रौशन करेगी. सानिया के प्रदर्शन से टेनिस की तरफ़ लोगों का ध्यान बढ़ेगा और बहुत सारे नये उभरते खिलाड़ियों को प्रोत्साहन मिलेगा.
<br />Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1105336687658800002005-01-11T13:47:00.000-08:002005-01-16T20:16:38.160-08:00अरेंज्ड लवमुझसे जब भी कोई कोई पूछता है कि आपकी अरेंज्ड मैरिज हुई थी या फिर लव मैरिज, तो मैं बोलता हूँ कि जी नहीं हमारा अरेंज्ड लव हुआ था. सच पूछये तो मेरा पहला प्यार भी मेरी अरेंज्ड मैरिज से ही शुरू हुआ था.
<br />
<br /><img alt="Akshargram Anugunj" src="http://pnarula.com/images/akshargram/anugunj.jpg" align="right" height="100" hspace="5" vspace="5" width="187" />
<br />
<br />
<br />इससे पहले की मैं आपको अपने अरेंज्ड लव के बारे मेँ बताऊं, मैं उससे पहले के प्यार संबंधी जो भी मेरे अनुभव है वो आपके सामने हाज़िर करता हूं.. किशोरावस्था में लड़कियों की तरफ़ आकर्षण और इकतरफ़ा प्यार तो कई बार हुआ लेकिन कोई भी बात मेरी तरफ़ से दूसरी तरफ़ न गई और दिल की बात दिल ही में रह गई .. इसकी मुख्य वजह ये थी कि मैं लड़कियों के साथ बात करने में असहज हो जाता था और लड़कियों से कभी खुल के बात नहीं कर पाता था. शायद इस लिये कि जिस माहौल में मैं पला बढ़ा उसमें हमारा लड़कियों के साथ मिलना जुलना बहुत कम ही था, या फिर मैं लड़कियों के मामले में मैं शुरु से ही डरपोक था.
<br />
<br />कालेज की पढ़ाई ख़त्म होने के बाद मैं नया नया बंबई पहुँचा था .. जल्द ही मुझे एक अच्छी नौकरी मिल गई .. हम लोगों का २०-२५ trainees का एक ग्रुप था .. इसमें ४-५ लड़कियां भी थीं .. मैं इनमें से एक लड़की संजना को मन ही मन चाहने लगा और उससे मेलजोल बढ़ाने की कोशिश करने लगा लेकिन संजना ने उल्टा मुझसे दूरी बनाना शुरु कर दी, शायद उसे ऐसा लगता था कि मैं सिर्फ़ उसे पटाना चाहता हूँ .उस वक्त तो मुझे बहुत बुरा लगता था लेकिन अब सोचता हूं तो लगता है वो सिर्फ़ जवानी का एक शग़ल था.
<br />
<br />कुछ दिनों बाद ही मेरे लिये एक रिश्ता आया. मैं अपने मां और पिताजी के साथ अपनी होने वाली पत्नि के घर पहुंचा. सबकी मौज़ूदगी में ही में मैंने अपनी भावी पत्नि से १०-१५ मिनट तक बात की. मेरे सामने बैठी हुई लड़की मुझे हर तरह से अच्छी लग रही थी और मैं मन ही मन फूला नहीं समा रहा था. जल्द ही हमारा रिश्ता तय हो गया. इसके बाद शुरु हुआ हमारा अरेंज्ड लव. रोज़ रात को देर देर तक हम लोगों की फोन पर बातें होती थीं. आफ़िस में मेरा मन नहीं लगता था और अपनी मंगेतर का ख़ूबसूरत चेहरा सपनों में नज़र आता था. अक्सर वीकेन्ड पर हम लोग बाहर जाते थे और होता था साथ में घूमना, पिक्चर देखना और रेस्तरां में प्यार भरी बातें करना. सोते जागते हर पल मेरे दिमाग में मेरी मंगेतर की तस्वीर रहती थी.
<br />
<br /><div align="justify"> </div><div align="justify"> </div><div align="justify"></div><div align="justify"> <div style="text-align: left;">इधर आफ़िस में संजना के स्वभाव में मैने तब्दीली महसूस की, और वो मुझे Ignore करने के बजाय मुझ पर ज्यादा ही मेहरबान होने लगी थी. शायद अब मुझसे उसे किसी किस्म के खतरे का अहसास नहीं था या फिर उसे कुछ लड़कियों वाली ईर्ष्या होने लगी थी. बहरहाल जो भी हो अब मैं तो उससे सिर्फ़ औपचारिक तौर पर ही मिलता था.
<br />
<br /></div> <div style="text-align: left;">मंगनी के कुछ महीने बाद ही कम्पनी ने मुझे लंदन १ साल के प्रोजेक्ट पर भेज दिया. और फिर शुरू हुआ हम लोगों का लांग डिसटैन्स रोमांस. हम लोग काफ़ी देर तक फोन पर बातें करते थे.. इससे और कोई ख़ुश हो न हो लेकिन ब्रिटिश टेलीकाम वाले जरुर ख़ुश रहते थे क्योंकि मेरा टेलीफोन बिल काफ़ी बढ़ जाता था. मैं फोन के जरिये अपनी मंगेतर को लंदन के नजारे दिखाता था. कभी कभी हम दोनों का इतना दूर होना मुझे बहुत अखरता था. कहते है कि दूरी से प्यार की कसक और बढ़ जाती है.</div> </div><div align="justify">
<br /><div style="text-align: left;">लगभग एक साल के बाद मैं लंदन से वापस लौटा. हम लोगों का मिलना जुलना फिर से शुरु हो गया. कुछ महीनों बाद हम लोगों की शादी हो गई और हमारा प्यार शादी के अटूट बंधन में बंध गया. </div> </div>Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1104946269584923722005-01-05T09:27:00.000-08:002005-01-16T20:15:25.916-08:00बम्बई मेरी जान<div style="text-align: left;">कुछ दिनों पहले सुकेतू मेहता की क़िताब <a href="http://nklblog.blogspot.com/2004/12/book-review-maximum-city-bombay-lost.html">maximum-city </a>पढी तो बम्बई की यादें ताज़ा हो गईं. अपने कालेज के दिनों में मुझे बंबई के प्रति ज़बरदस्त आकर्षण था. जब भी किसी बातचीत में बंबई का नाम आता था तो मेरे चहरे पे एक ख़ास क़िस्म की मुस्कान आ जाती थी जैसे की किसी ने मेरी स्वपन नगरी का नाम ले लिया या फिर मेरे मन की बात कह दी हो. कालेज की पढ़ाई ख़त्म होने के बाद मैं अपना बोरिया बिस्तर ले के अपनी कर्मभूमि बंबई में पहुँच गया. </div><div align="justify">
<br /><div style="text-align: left;">बंबई के एक सुदूर उपनगर में मैं अपने एक रिश्तेदार के यहां रहता था. मैंने नौकरी ढूंढना शुरू कर दी. और बंबई की लोकल ट्रेनों में मेरी आवाजाही शुरू हो गई. ६ महीने के शुरूआती संघर्ष के बाद मुझे एक बहुत ही अच्छी नौकरी मिल गई और इस तरह से बंबई के साथ मेरा रोमांटिक अफ़ेयर शुरू हो गया.</div> </div><div align="justify">
<br /><div style="text-align: left;">मुझे बंबई की ज़िन्दगी रास आने लगी और मैं बंबईया रंग में डूबने लगा. शुरू शुरू में बंबई की हर शै मस्त लगती थी, ट्रेनों मे भजन मंडली गाते लोग , बंबईया हिन्दी बोलते लोग , हर वक़्त व्यस्त रहने वाले लोग, घूमने की जगहें जैसे गेटवे आफ़ इंडिया, जूहू बीच , चौपाटी बीच , मछलीघर आदि. तरह तरह के रेस्टारेन्ट और पब्स. मेरे दिन हंसीख़ुशी में गुज़र रहे थे. इन दिनों मेरे दिल में इस तरह के विचार आते थे.</div> </div>
<br />न जाने क्या बात है , बम्बई तेरे शबिस्तां में
<br />कि हम शामे-अवध, सुबहे-बनारस छोड़ के आ गये
<br /><div align="justify">
<br /><div style="text-align: left;">लेकिन धीरे धीरे हालात बदलने लगे या फिर मेरा नज़रिया बदलने लगा. कुछ तो आफ़िस में काम का प्रेशर , कुछ commuting की थकान , कुछ मेरी सेहत की बदहाली , कुछ बंबई की भागदौड़ वाली ज़िन्दगी इन सब चीज़ों ने मेरा जीवन मुश्किल कर दिया. जैसे जैसे ३ ४ साल गुज़रे बंबई से मेरा मोहभंग होता गया और मुझे बंबई के जीवन से घ्रणा और डर लगने लगा. चारों तरफ़ भीड़, गन्दगी , भागदौड़ , ग़रीबी और मारामारी ये सब देखकर मेरे अंदर घबराहट सी पैदा हो जाती थी और मेरे हौसले पस्त होने लगे थे. मुझे अपनी हालत 'गमन' फ़िल्म के हीरो की तरह लगती जो बंबई मे परेशानहाल होके ऐसे कहता है.</div> </div>
<br />सीने में जलन , आंखों में तूफ़ान सा क्यों है
<br />इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है
<br /><div align="justify">
<br /><div style="text-align: left;">आज़ भी हलांकि मैं एक तरह से बंबई के नाम से घबराता हूं या फिर नफ़रत करता हूं,लेकिन फिर भी मेरे दिल का कोई कोना अभी भी बंबई से जुड़ा हुआ महसूस करता है बिल्कुल ऐसे जैसे आदमी अपने पहले प्यार को कभी भुला नहीं पाता है.</div> </div>Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1104384451716046012004-12-29T21:26:00.000-08:002004-12-29T21:27:31.716-08:00सुनामी पीड़ितों के लिये प्रार्थनासामन्यतया मैं अपने ब्लाग पर समाचारों की चर्चा नहीं ही करता हू लेकिन सुनामी के कहर और दिल दहला देने वाली तबाही के समाचार सुन कर रहा नहीं जाता. ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि सभी पीड़ित लोगों और उनके परिवारजनों को इस मुसीबत से बाहर निकलने की शक्ति प्रदान करे.
<br />Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1104359645975147992004-12-29T14:33:00.000-08:002004-12-30T16:56:26.870-08:00स्वभावमेरी आदत है कि अपनी कमज़ोरियों का बखान भी खुल के कर देता हूं. लेकिन मेरी बीवी को मेरी ये हरक़त बिल्कुल भी पसन्द नहीं है. अभी कुछ दिन पहले की बात है जब हमारे मित्र क हमारे यहां सपरिवार रात्रिभोज पर आये हुये थे. मैं कुछ बातें जैसे कि काम में मेरा मन न लगना, आलस, एक बार client site पर मेरी कामचोरी लगभग पकड़ी जाना वग़ैरह के बारे में बोलने लगा. जाहिर है कि हमारी श्रीमती जी को ये बिल्कुल नागवार गुज़रा और उन्होने कई बार कोशिश की बातों के सिलसिले को किसी दूसरी तरफ़ मोड़ दिया जाय.
<br />
<br />अगले दिन हमें बीवी ने ख़ूब खरीखोटी सुनाई. मैंने अपनी सफ़ाई में ये कहने की कोशिश की मैं अपनी बुराई खुले और प्रत्यछ रुप से कहता हूं और शायद कई बार नाटकीय अंदाज़ में उसे थोड़ा बढ़ा चढ़ा भी देता हूं. लेकिन अपनी तारीफ़ सूछ्म और अपरोछ ढंग से करता हूं. और मैं तो यही समझता हूं कि ज़्यादातर लोग मेरे अंदाज़ को परख़ कर बात को सही नज़रिये से देख लेते होंगे. लेकिन बीवी ने हमें समझाया कि जरुरत से ज़्यादा विनम्र बनने की कोई जरुरत नहीं है क्यूंकि इसका मतलब लोग जतायेंगे कि आप तो कमज़ोर हैं. और ज़्यादा खुलेपन से काम लेने की भी कोई जरुरत नहीं है क्यूंकि ये आपने पांव में कुल्हाड़ी मारने के समान हो सकता है क्यूंकि आफ़िस में चुगली भी हो सकती है.
<br />
<br />हमने भी बीवी की बात को मानते हुये निर्णय किया कि हम अपने आप पर संयम रखेंगे और बीच का रास्ता अख़्तयार करेंगे. कुछ ही दिनों बाद हम लोग क के साथ बाहर डिनर पर गये. बीवी ने हमें सख़्त हिदायत दे रखी थी. हमने भी बीवी के हुक्म पर अमल किया और डिनर के दौरान ऐसी कोई भी ऐसी बात नहीं कि जो नकारात्मक या अपने आप को कम साबित करने वाली लगे. बल्कि हर बात को मैंने काफ़ी सकारात्मक ढंग से पेश किया. बाद में हमने घर आके श्रीमतीजी से पूछा तो उन्होनें बताया कि मैं आज के इम्तहान में पास हो गया हूं. उस दिन के बाद से श्रीमतीजी हमसे काफ़ी ख़ुश हैं क्यूंकि हमने उन्हें शिकायत का मौका ही नहीं दिया.
<br />Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1104012362893606072004-12-25T14:05:00.000-08:002005-01-01T22:56:41.810-08:00सड़क किनारे पाख़ाना करने वालों पर(कविता लिखने का मुझमें ज़रा भी शऊर नहीं है. अपने बम्बई प्रवास के दौरान अक्सर सुबह को झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले ग़रीब लोगों को सड़क किनारे लोटा लिये हुए देखता था. उसी पर कुछ पंक्तियां लिख दी थीं. अब इसे इस चिट्ठे में छापने की ज़ुर्रत कर रहा हूं. उम्मीद है कि क़ाबिल पाठक मेरी इस ग़ुस्ताख़ी को माफ़ कर देंगे.)
<br />
<br />अलसुबह निकला मैं दौड़ने के लिए
<br />देखा मैंने उसको सड़क किनारे बैठे हुए
<br />हाथ में लोटा और मुंह में दातून लिये
<br />
<br />अनचाहे ही मैंने एकबार उसको देखा
<br />अपने दुखों और जमाने से बेफ़िक्र वो बैठा था
<br />मैंने सोचा बेशर्म कहीं का, नहीं बेचारा कहीं का
<br />
<br />अचानक मुझे याद आया जब मैं नये घर में आया था
<br />दो के बजाय एक ही संडास पाकर चिल्लाया था
<br />एक ये था जिसने सड़क से ही काम चलाया था
<br />
<br />वो तो ख़ैर फिर भी एक मर्द ही था
<br />और शायद इसीलिये बेफ़िक्र सा बैठा था
<br />लेकिन ऐसी औरतों को क्या नहीं सहना होता होगा
<br />
<br />जब पड़ती होंगी उनपर बदजात निगाहें
<br />गड़ जाती होंगी जमीन में वो शर्म के मारे
<br />आख़िर वो भी तो होंगी किसी कि मां और बहनें
<br />
<br />आख़िर इन लोगों का कसूर है क्या?
<br />यही कि भगवान ने इन्हें ग़रीब बनाया
<br />क्यूं ऊपरवाले ने ऐसा संसार बनाया?
<br />
<br />सब लोग इन्हें देखकर अनदेखा कर जाते हैं
<br />ताज़िन्दगी ये लोग ऍसे ही गुज़ार जाते हैं
<br />रोज़ मर मर कर भी, ज़िन्दगी जिये जाते हैं
<br />Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1103777265823088882004-12-22T20:47:00.000-08:002005-01-16T20:19:34.816-08:00पाप नगरी<p><span style="font-size:0;"></span></p><p><span style="font-size:0;"></span></p> <div style="text-align: left;">करीब एक महीना पहले मैं सपरिवार ३ दिन के लिए लास वेगास घूम के आया हूं. वैसे तो इस शहर को पाप नगरी (Sin City) के नाम से जाना जाता है लेकिन वहां पर ऐसा लग रहा था कि किसी भी पवित्र नगरी के मुक़ाबले में यहाँ पर ज़्यादा आनन्द है. हर आदमी अपनी धुन में मस्त था. कुछ क़िताबें कहतीं हैं कि चाहे आप इस शहर को पसंद कीजिए या फिर नफ़रत करें लेकिन एक बार देखें जरूर. मेरे अपने अनुभव के बाद मैं भी इस बात से कुछ हद तक सहमत हूं.
<br /></div> <p align="justify">
<br /></p> <div style="text-align: left;">हम लोग वहां पर ३ दिन रहे. वैसे तो ये पाप नगरी वयस्क मनोरंजन के लिय॓ ज़्यादह मशहूर (या फिर बदनाम)है लेकिन हमे पारिवारिक द्रश्टिकोण से भी काफ़ी अच्छा लगा. मेरी पत्नि और बच्चे दोनों को वहां काफ़ी अच्छा लगा. रेगिस्तान के बीचोंबीच में ये आधुनिक स्वर्ग बसाया गया है. इस शहर के लोगों की जीवनधारा पर्यटन उधोग से जुड़ी है. पूरा शहर बड़े बड़े होटलों और सैलानियों से आबाद है.
<br /></div> <p align="justify">
<br /></p> <div style="text-align: left;">यहां की सबसे मुख्य जगह है लास वेगास बुलेवर्ड रोड जिस के दोनों तरफ़ कसीनो होटेल हैं. इस मेन रोड को स्ट्रिप (Strip) कहते हैं. ज्यादातर समय लोग इसी स्ट्रिप के आसपास गुज़ारते हैं. हर होटेल काफी बड़ा है और होटेल की इमारत किसी न किसी थीम पर आधारित है. कोई मिस्र के पिरामिड की तरह बना है, कोई किले की तरह बना है , कोई महल की तरह बना है. हर होटेल में जुआघर (Casino) के साथ साथ मदिरापान , शापिंग बाज़ार और बच्चों के खेलने की जगहें हैं.
<br /></div> <p align="justify">
<br /></p> <div style="text-align: left;">हर होटेल इस होड़ में लगा है कि कैसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को अपने होटेल की तरफ आकर्षित किया जा सके. इसलिए हर होटेल में तरह तरह के मनोरंजक प्रोग्राम जैसे कि सर्कस , जिमनास्टिक , ड्रामा इत्यादि चलते रहते हैं. यहाँ पर हर चीज़ भव्य स्तर पर बनायी जाती है. कहते हैं कि जैसे ही कोई होटेल १०-१५ साल पुराना हो जाता है उसे तोड़ के उसी जगह पर नये नाम से एक नया होटेल बना दिया जाता है.
<br /></div> <p align="justify">
<br /></p> <div style="text-align: left;">लास वेगास से एक दिन का बस टूर लेके हम लोग भव्य गहरी घाटी (Grand Canyon) देखने गये. ये कैन्यन वाकई भव्य और बहुत ही ख़ूबसूरत है. कुदरत का ये करिश्मा वाकई लाज़वाब है. ये गहरी घाटी काफ़ी बड़ी है और इसे तीन तरफों से देखा जा सकता है. हम लोग पश्चिमी हिस्से की तरफ से देखने गये थे. यहां के हिस्से के आसपास की जमीन सरकार ने अमेरिकन मूलनिवासियों की हुआलापाई जाति को दे रखी है और इसका नाम है हुआलापाई इंडियन रिज़र्वेशन.
<br /></div> Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1103691893435660632004-12-21T20:50:00.000-08:002005-01-16T20:13:16.513-08:00शान्ति भंगदोस्तों,
<br /><div align="left">
<br /><div style="text-align: left;">सबसे पहले सभी हिन्दी ब्लागर्स को मेरा प्रणाम. मेरे ब्लाग को पढने और आपके बहुमूल्य कमेन्ट्स के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.आपने इस नौसिखये का काम बना दिया.
<br /></div>
<br />पिछले २ सालों से मैं यहां Bay Area मेँ एक ही client के साथ एक ही प्रोजेक्ट में काम कर रहा था. घर से आफ़िस सिर्फ़ १० मिनट पैदल दूरी पर था,लेकिन जैसे कि कुछ समय से मुझे जिस बात का डर था वही बात हो गई और इस प्रोजेक्ट की समाप्ति हो गई है. और मुझे नये प्रोजेक्ट में डाल दिया गया है. आप पूछेंगें कि इसमें समस्या क्या है, तो दरअसल बात ये है कि मुझे एक घंटा सुबह और एक घंटा शाम को कार में commuting करनी पड़ रही है. और सिर्फ़ यही नहीं जहां पहले दिन में सिर्फ़ ३-४ घंटे का काम होता था वहीं अब ८-१० घंटे रगड़ के काम करना पड़ रहा है.
<br />
<br />एक तरफ़ मेरा मन कहता है कि जरा मर्द के बच्चे बनो तो एक दूसरी आवाज़ कहती है कि कहां फँसा दिया यार. इसलिए अपने आप को इन बातों से दिलासा दे रहा हूं कि शायद इस में भी कुछ भला ही निहित होगा. अँग्रेज़ी कहावत This too shall pass तो आपने सुनी ही होगी, तो ये छोटी सी मुश्किल भी गुज़र ही जाएगी.
<br />
<br />- रमन
<br /></div>
<br />Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1102917241702282382004-12-12T21:43:00.000-08:002004-12-19T16:50:44.740-08:00ज़िन्दगी झन्टUP में मेरे कस्बे में जब भी किसी को ये कहना होता था कि उन के साथ कुछ ठीक नहीं चल रहा है तो लोग कहते थे कि ज़िन्दगी झन्ट हो गई है पिछले कुछ दिनों से मेरी ज़िन्दगी भी झन्ट हो गई है मैं काफ़ी depressed महसूस कर रहा था, इस वज़ह से परेशान सा था इसकी कई वज़हें थीं और हैं लेकिन इस वक़्त उन पे ज्यादा खुलासा नहीं कर रहा हूं
<br />वैसे अब मैं काफ़ी ठीक महसूस कर रहा हूं ब्लागिंग का ये नया शौक भी काफ़ी मदद पहुंचा रहा है बीच बीच में टेनिस भी खेलता रहता हूं आफ़िस के काम मुझे बिल्कुल भी मज़ा नहीं आता लेकिन क्या करे आजीविका के लिये पैसों का यही एकमात्र स्रोत है
<br />Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1102872240937221052004-12-12T09:23:00.000-08:002004-12-12T21:42:04.143-08:00ग़ज़ल - तकी मौधवीइस कदर बढती जाती हैं मजबूरियां , हर नफ़स है ग़रां ज़िन्दगी के लिए
<br />गो बहुत तल्ख़ है जामे-उल्फ़त मगर , इक सहारा तो है आदमी के लिए
<br />
<br />दिल में नाकामियों का तआसुर लिए , लौटना अपनी मन्ज़िल से बेसूद है
<br />रास्ते पुरख़तर हैं तो होते रहें , हौसला चाहिए आदमी के लिए
<br />
<br />आज तक ये मुअम्मा न समझा कोई, और शायद न कोई समझ पाएगा
<br />ज़िन्दगी आई है मौत के वास्ते , या कि मौत ज़िन्दगी के लिये
<br />
<br />लोग जश्ने-चराग़ां मनाते रहे , जाने कितने शहर जगमगाते रहे
<br />इक तरफ़ आलमे-तीरगी में पड़े , हम तरसते रहे रौशनी के लिये
<br />
<br />मुझपे इल्ज़ामे-तख़रीबकारी न रख , बाग़बां मैं चमन का वफ़ादार हूं
<br />रंज़ो-ग़म जाने कितने गवारा किये , मैंने तेरे चमन की ख़ुशी के लिये
<br />
<br />ये वो दौरे-पुराशोब है दोस्तों , जिसमें कोई किसीका भी हमदम नहीं
<br />कौन हमदर्द होगा किसी का 'तकी' , आदमी जब नहीं आदमी के लिये
<br />
<br />
<br />Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1102870558456618562004-12-12T08:44:00.000-08:002004-12-12T21:42:21.736-08:00ग़ज़ल - हामिद बहराईचीइन आंखों में बरसात का आंगन न मिलेगा
<br />तुम लौट के आओगे तो सावन न मिलेगा
<br />
<br />कि रोके से रुकेंगे न ये बहते हुए आंसू
<br />जब जाके इन्हें आपका दामन न मिलेगा
<br />
<br />कान्हा तेरी मुरली की सदा कौन सुनेगा
<br />राधा तो मिलेगी यहां मधुबन न मिलेगा
<br />
<br />'हामिद' न यकीं आए तो तुम देख लो आके
<br />घर पे मेरे टूटा हुआ बर्तन न मिलेगा
<br />Ramannoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-8932637.post-1102715085183287982004-12-10T13:44:00.000-08:002004-12-12T09:04:36.486-08:00शुरूआतबहुत दिनों से हिन्दी ब्लाग लिखने का विचार था , लेकन ये शुरु नहीं हो रहा था. अब जा के इस की शुरूआत कर रहा हूं . तकरीबन १ महीने पहले मैंने अंग्रेज़ी ब्लाग लिखना शुरु किया है. बीच बीच में अन्य हिन्दी ब्लाग भी पढता रहता हूं.
<br />Ramannoreply@blogger.com