रविवार, दिसंबर 12, 2004

ग़ज़ल - तकी मौधवी

इस कदर बढती जाती हैं मजबूरियां , हर नफ़स है ग़रां ज़िन्दगी के लिए
गो बहुत तल्ख़ है जामे-उल्फ़त मगर , इक सहारा तो है आदमी के लिए

दिल में नाकामियों का तआसुर लिए , लौटना अपनी मन्ज़िल से बेसूद है
रास्ते पुरख़तर हैं तो होते रहें , हौसला चाहिए आदमी के लिए

आज तक ये मुअम्मा न समझा कोई, और शायद न कोई समझ पाएगा
ज़िन्दगी आई है मौत के वास्ते , या कि मौत ज़िन्दगी के लिये

लोग जश्ने-चराग़ां मनाते रहे , जाने कितने शहर जगमगाते रहे
इक तरफ़ आलमे-तीरगी में पड़े , हम तरसते रहे रौशनी के लिये

मुझपे इल्ज़ामे-तख़रीबकारी न रख , बाग़बां मैं चमन का वफ़ादार हूं
रंज़ो-ग़म जाने कितने गवारा किये , मैंने तेरे चमन की ख़ुशी के लिये

ये वो दौरे-पुराशोब है दोस्तों , जिसमें कोई किसीका भी हमदम नहीं
कौन हमदर्द होगा किसी का 'तकी' , आदमी जब नहीं आदमी के लिये



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