शनिवार, दिसंबर 25, 2004

सड़क किनारे पाख़ाना करने वालों पर

(कविता लिखने का मुझमें ज़रा भी शऊर नहीं है. अपने बम्बई प्रवास के दौरान अक्सर सुबह को झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले ग़रीब लोगों को सड़क किनारे लोटा लिये हुए देखता था. उसी पर कुछ पंक्तियां लिख दी थीं. अब इसे इस चिट्ठे में छापने की ज़ुर्रत कर रहा हूं. उम्मीद है कि क़ाबिल पाठक मेरी इस ग़ुस्ताख़ी को माफ़ कर देंगे.)

अलसुबह निकला मैं दौड़ने के लिए
देखा मैंने उसको सड़क किनारे बैठे हुए
हाथ में लोटा और मुंह में दातून लिये

अनचाहे ही मैंने एकबार उसको देखा
अपने दुखों और जमाने से बेफ़िक्र वो बैठा था
मैंने सोचा बेशर्म कहीं का, नहीं बेचारा कहीं का

अचानक मुझे याद आया जब मैं नये घर में आया था
दो के बजाय एक ही संडास पाकर चिल्लाया था
एक ये था जिसने सड़क से ही काम चलाया था

वो तो ख़ैर फिर भी एक मर्द ही था
और शायद इसीलिये बेफ़िक्र सा बैठा था
लेकिन ऐसी औरतों को क्या नहीं सहना होता होगा

जब पड़ती होंगी उनपर बदजात निगाहें
गड़ जाती होंगी जमीन में वो शर्म के मारे
आख़िर वो भी तो होंगी किसी कि मां और बहनें

आख़िर इन लोगों का कसूर है क्या?
यही कि भगवान ने इन्हें ग़रीब बनाया
क्यूं ऊपरवाले ने ऐसा संसार बनाया?

सब लोग इन्हें देखकर अनदेखा कर जाते हैं
ताज़िन्दगी ये लोग ऍसे ही गुज़ार जाते हैं
रोज़ मर मर कर भी, ज़िन्दगी जिये जाते हैं

Comments:
एक बार हमने भी किया था, हैदराबाद से बङ्गलोर आते हुए,
दीवाली के बाद, पेट बहुत ख़राब था।
क्या करते, जाना ही पड़ा।
हम भी चिल्लाए थे कि बस में पाखाना नहीं है।
 
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